वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने के चक्कर में 11 दिनों तक नहीं सोया था ये शख्स (Image Credit- Instagram)
साल था 1963 अमेरिका के सैन डिएगो में रहने वाला 17 वर्षीय छात्र रेन्डी गार्डनर अपने दो दोस्तों के साथ बैठा बातें कर रहा था। बातचीत किसी मज़ाकिया मोड़ पर पहुंच गई, और बात निकली — "कितने दिन तक इंसान बिना सोए रह सकता है?" फिर क्या था, मज़ाक शर्त में बदल गई। रेन्डी ने फैसला किया कि वह एक विज्ञान प्रोजेक्ट के तहत 11 दिन तक बिना नींद के रहेगा। किसी को अंदाजा नहीं था कि ये निर्णय सिर्फ एक चुनौती नहीं, बल्कि वैज्ञानिक इतिहास में दर्ज हो जाने वाला प्रयोग बनने वाला है।
दोस्ती की शर्त या विज्ञान का पागलपन?
रेन्डी ने जब यह फैसला लिया, तब उसके दो दोस्तों ब्रूस और जोए ने उसका साथ देने की ठानी। शुरुआत में ये बस एक रोमांचक अनुभव की तरह था। कोई अलार्म नहीं, कोई नींद नहीं — बस caffeinated drinks, बातों की रातें, और लगातार active रहने की कोशिश। यह सब विज्ञान प्रोजेक्ट के लिए था, लेकिन धीरे-धीरे यह एक ऐसी कहानी बन गई जिसमें शरीर और दिमाग की सीमाएं परखी गईं।
दिन 1 से 3: मज़ा, हंसी और ऊर्जा
शुरुआती 2–3 दिन रेन्डी को कोई खास दिक्कत नहीं हुई। थोड़ी थकान ज़रूर हुई लेकिन दोस्तों के बीच होने से माहौल हल्का रहा। वो गेम्स खेलता, बातचीत करता, कभी-कभी टहलता, लेकिन नींद नहीं लेता। उसे खुद भी यकीन नहीं था कि उसका शरीर इतना साथ देगा। इस समय तक वैज्ञानिकों को इसमें कोई खतरा नहीं दिखा।
दिन 4 से 6: असल परीक्षा की शुरुआत
अब शरीर और दिमाग धीरे-धीरे जवाब देने लगे थे। रेन्डी की आंखों के नीचे काले घेरे दिखने लगे थे। ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो रहा था। उसे अपने शब्द याद नहीं रहते थे। कई बार वो यह भी भूल जाता था कि वो क्या कर रहा था। एक दिन उसने सोचा कि वह NFL खिलाड़ी है और फुटबॉल मैच में खेलने जा रहा है। यह उसका पहला hallucination था।
इस दौरान Stanford University के डॉक्टर विलियम डिमेंट ने भी प्रोजेक्ट में दिलचस्पी ली और खुद रेन्डी के अनुभवों को डॉक्युमेंट करना शुरू किया। यह अब सिर्फ एक चुनौती नहीं, वैज्ञानिक प्रयोग बन चुका था।
दिन 7 से 9: नींद का दबाव, दिमाग की लड़ाई
अब रेन्डी को एक-एक पल भारी लगने लगा था। वह बात करते-करते बीच में चुप हो जाता था, कुछ याद दिलाने पर भी वह चौंक जाता था। वह समय का अहसास खो बैठा था। पलकें भारी हो जातीं, शरीर झुकने लगता, लेकिन दोस्तों ने उसे झटकों से, तेज़ आवाज़ों से और बातचीत के सहारे जगा के रखा।
सबसे हैरानी की बात ये थी कि रेन्डी अब भी chess या pinball जैसे गेम्स अच्छे से खेल पा रहा था — यह दिखाता है कि इंसानी दिमाग का कुछ हिस्सा कितना resilient होता है, जबकि बाकी हिस्सा शटडाउन मोड में जा चुका होता है।
दिन 10 और 11: चेतना की सरहद पर
अब वो पल आ गया था जब रेन्डी एक चलती-फिरती नींद बन चुका था। वह खड़ा रहता, आंखें खुली होतीं, लेकिन वह पूरी तरह से होश में नहीं होता। वो बोलता, लेकिन बातें बेमतलब होतीं।
एक रिपोर्ट के अनुसार, डॉक्टर डिमेंट ने उसे एक आसान सा टेस्ट दिया — 100 में से 7 घटाना। रेन्डी 93 तक पहुंचा और फिर भूल गया कि वो क्या कर रहा था। इस बिंदु पर सभी को समझ आ गया कि वह अब अपने शरीर की सीमा पार कर चुका है।
अंतिम क्षण: नींद की गहराई में वापसी
11 दिन और लगभग 24 मिनट तक जागने के बाद, रेन्डी को सैन डिएगो के एक नेवल अस्पताल में ले जाया गया। वहां उसका EEG किया गया और फिर उसे सोने दिया गया। उसने पहले 14 घंटे लगातार नींद ली, फिर थोड़ी देर उठकर कुछ खाया, और दोबारा सो गया। यह नींद बहुत restorative थी और आश्चर्यजनक रूप से उसका शरीर जल्दी रिकवर हो गया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई...
नींद की कीमत — जब जिंदगी में असर दिखने लगे
हालांकि शुरू में लगता था कि रेन्डी को कोई स्थायी नुकसान नहीं हुआ, लेकिन सालों बाद दिए गए एक इंटरव्यू में उसने बताया कि उसे insomnia की समस्या रहने लगी थी। कभी-कभी वह रात भर जागता, बिना किसी वजह के। वो कहता था —
“कभी-कभी मुझे नींद आती ही नहीं थी। मैं बस लेटा रहता, और सोचता जाता — शायद मेरे ही साथ ऐसा हो रहा है।”
वैज्ञानिकों के लिए यह प्रयोग एक चमत्कार था — उन्होंने देखा कि नींद के बिना इंसानी शरीर और दिमाग किस हद तक जा सकते हैं, लेकिन खुद रेन्डी के लिए ये एक लंबी मानसिक और शारीरिक यात्रा थी।
वैज्ञानिक पहलू और चेतावनी
रेन्डी गार्डनर का यह कारनामा उस समय का सबसे लंबा documented sleeplessness रिकॉर्ड था, जिसे गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी दर्ज किया गया था। लेकिन बाद में गिनीज़ ने ऐसे किसी भी sleep deprivation रिकॉर्ड को मान्यता देना बंद कर दिया क्योंकि यह स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक माना गया। आज नींद पर आधारित रिसर्च बताती है कि:
24 घंटे से ज्यादा जागना alcohol intoxication जितना dangerous होता है।
48 घंटे बाद attention, memory और निर्णय क्षमता पर असर पड़ता है।
72 घंटे से ज्यादा जागना delusion और psychosis जैसी स्थिति ला सकता है।

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