कभी वोट सिर्फ चुनने का हक़ होता था, आज वो डर, भरोसा और सवालों का जवाब बन गया है।
19 जून 2025
दिन भले ही आम लग रहा हो, लेकिन भारत के चार राज्यों में, पांच विधानसभा सीटों पर जो हो रहा है — वो सिर्फ चुनाव नहीं है।
ये जनता का एक अनकहा जवाब है — हाल ही में हुए Pahalgam हमले के बाद का जवाब।
पश्चिम बंगाल, केरल, पंजाब और गुजरात — अलग-अलग क्षेत्र, अलग-अलग ज़बानें, अलग-अलग मुद्दे।
लेकिन इन सबके बीच एक बात कॉमन है — एक नया माहौल, जो सिर्फ उम्मीदवारों से नहीं, बल्कि डर और सुरक्षा की कहानी से बना है।
जब राजनीति के बीच उतर आया डर
पिछले महीने हुए Pahalgam आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया।
यह सिर्फ एक हमला नहीं था, यह एक सीधा सवाल था —
"हम कितने सुरक्षित हैं?"
लोगों की आंखों में आक्रोश था, लेकिन दिलों में डर भी था।
और जब ऐसे में वोटिंग होती है — तो वो सिर्फ 'किसे जीताना है' का मामला नहीं रहता।
वो एक साइलेंट रिएक्शन बन जाती है — जहां हर वोट एक सोच बनकर निकलता है।
पाँच सीटें, पाँच तस्वीरें
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बंगाल में लोगों की निगाहें किसी पार्टी से ज्यादा अपने मोहल्ले की शांति पर टिकी थीं।
कुछ वोटर कहते दिखे — "हमें चाहिए ऐसा नेता जो CCTV से नहीं, भरोसे से सुरक्षा दे।" -
केरल में पर्यटकों और युवाओं की चर्चा एक ही बात पर टिकी थी — अगर हम वोट देंगे तो क्या कुछ बदलेगा?"
किसी ने कहा — “हम दरअसल आतंकवाद को नहीं, उस चुप्पी को हराना चाहते हैं जो सिस्टम में बैठ गई है।” -
पंजाब में मतदान केंद्रों के बाहर अजीब सी खामोशी थी।
ना नारेबाज़ी, ना लंबी कतारें — लेकिन अंदर वोट जरूर पड़ रहे थे।
वहां एक बुज़ुर्ग महिला ने कहा — “हमारे बेटे बॉर्डर पर हैं, अब हम अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभा रहे हैं।” -
गुजरात की दो सीटों पर वोटिंग शांतिपूर्ण थी, लेकिन वहां चर्चा सिर्फ विकास की नहीं थी।
“अब हमें सिर्फ बिजली-पानी नहीं, अपनी बहनों और बच्चों के लिए एक सुरक्षित राज्य चाहिए,” एक युवा मतदाता बोला। -
सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि लोग अब मुद्दों की बारीकी में जाने लगे हैं।
पहले जो वोट जाति, धर्म, या चेहरे देखकर पड़ता था — अब वो सवाल पूछने लगा है:
"अगर हमारे घर तक खौफ पहुंच सकता है, तो क्या नेता भी हमारे दरवाज़े तक जवाब देंगे?"
जनता की सोच में आया बदलाव
पहले चुनावों में पार्टी के पोस्टर देखकर, किसी एक चेहरे पर भरोसा करके वोट दिए जाते थे।
अब लोग कहते हैं —
"हम नेता नहीं, सोच चुन रहे हैं।"
कोई परिवार, जिसकी बेटी पहली बार बाहर पढ़ने गई है —
अब नेता से ये नहीं पूछ रहा कि कॉलेज कब खुलेगा,
बल्कि ये पूछ रहा है —
"क्या मेरी बेटी सुरक्षित लौटेगी?"
सिक्योरिटी तो है, लेकिन भरोसा?
हर बूथ पर सुरक्षा बल तैनात हैं, कैमरे लगे हैं, वेबकास्टिंग हो रही है।
कागज़ पर सब मजबूत लगता है।
लेकिन असली सवाल ये है —
क्या ये सब कुछ लोगों के डर को वाकई कम कर पाया है?
एक वोटर ने कहा —
“बाहर पुलिस है, लेकिन अंदर दिमाग में एक डर है — कहीं फिर कोई खबर न आ जाए।”
नेता क्या कह रहे हैं?
इस बार चुनाव प्रचार का टोन भी अलग था।
किसी ने वादा किया — “हम जवाब देंगे।”
किसी ने कहा — “हम मजबूती से खड़े हैं।”
तो किसी ने कहा — “ये समय साथ खड़े होने का है, आरोप लगाने का नहीं।”
लेकिन जनता को अब भाषण नहीं चाहिए।
उन्हें चाहिए working system, quick action, और एक ऐसा सिस्टम जो reactive नहीं, proactive हो।
सोशल मीडिया की चुप्पी
दिलचस्प बात ये रही कि इस बार सोशल मीडिया पर भी भीड़ उतनी ज़ोरदार नहीं दिखी।
लोग बोल जरूर रहे हैं — लेकिन loud नहीं।
ये चुप्पी शोर से ज़्यादा असरदार है।
जैसे हर पोस्ट, हर ट्वीट सिर्फ कह रहा हो —
"अब हम देख रहे हैं... और सोच कर वोट कर रहे हैं।"
असली मुद्दे क्या निकले?
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आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता
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राज्य की इंटरनल सिक्योरिटी
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स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ नेशनल मुद्दों की अहमियत
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केवल पार्टी नहीं, व्यक्ति की ईमानदारी और जवाबदेही
जनता पूछ रही है — क्या बदलाव आएगा?
लोग अब सिर्फ यह नहीं देख रहे कि कौन चुनाव जीतेगा,
बल्कि वो यह सोच रहे हैं —
"जो जीतेगा, वो क्या करेगा?"
हर वोट अब एक चेतावनी जैसा है —
“हम देख रहे हैं, और अगली बार फिर सोचेंगे — अगर तुमने भरोसा तोड़ा।”
बदलाव की शुरुआत — बायपोल से जनभावना तक
कहते हैं ना, बड़े बदलाव की शुरुआत छोटी जगह से होती है।
ये बायपोल्स भी कुछ वैसा ही हैं।
लोग अब रैलियों से नहीं, नेताओं के जवाबों से प्रभावित हो रहे हैं।
वो ये नहीं पूछते कि “आपने कितने रोड बनाए?”,
वो पूछते हैं —
“आपने कितनी बार किसी लाचार के सवाल का जवाब दिया?”
ये वोटिंग सिर्फ 5 सीटों की नहीं है…
ये एक साफ इशारा है आने वाले वक्त के लिए।
2026 में कई राज्यों में फिर चुनाव होंगे।
2029 में देश फिर लोकसभा के लिए वोट करेगा।
अगर इस बार जनता ने सोच समझकर वोट दिया है,
तो ये संकेत है —
“अब जनता बदल गई है।”
एक वोट, एक बदलाव, एक उम्मीद
कोई ये कहेगा कि ये महज़ एक बायपोल है —
लेकिन जिसने अपनी आंखों में आँसू के साथ वोट डाला है,
उसे पता है —
ये सिर्फ बटन दबाना नहीं था।
ये एक आवाज़ थी —
डर के खिलाफ, चुप्पी के खिलाफ, और उस सिस्टम के खिलाफ जो कभी-कभी अपने ही लोगों की आवाज़ सुनना भूल जाता है।

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